Ummul Kher UPSC Result IAS

उम्मुल बनी IAS- 16 फ्रैक्चर, 8 सर्जरी को हरा जीत गई उम्मुल

“मन के हारे हार है , मन के जीते जीत “

यदि मन में ठान लिया जाए ,जीत मेरी ही होनी है तो आपका जीतने से कोई नहीं रोक सकता| यह बात राजस्थान के पाली मारवाड़ में जन्मी उम्मुल खेर ने सिद्ध करके दिखाई|

ऑस्टियो जेनेसिस बीमारी के चलते उम्मुल की हड्डियां बहुत आसानी से बार बार टूट जाती है| 28 की उम्र तक उसे 16 फ्रैक्चर और 8 बार सर्जरी का सामना करना पड़ा है। उम्मुल व्हीलचेयर से चलती थी| उम्मुल के घर के हालत बहुत ख़राब थे| घर में बहुत गरीबी थी और सोतेली माँ और पिता का साथ न होने के साथ वह अकेली सी पड़ गई थी| परिवार में माता पता और तीन भाई बहन रहते थे| पिताजी फेरी का काम करते थे और माँ भी एक प्राइवेट नौकरी करती थी| कुछ समय बाद माँ को सीजोफ्रीनिया(मानसिक बीमारी) के दौरे पड़ने लगे| माँ की नौकरी छुट गई फिर पूरा परिवार हजरत निजामुद्दीन इलाके के झुगिया झोपडी में रहने लगा| 2001 में झोपड़ियाँ उड़ा दी गई थी| हम फिर से बेघर हो गए|

उम्मुल उस समय सातवी कक्षा में पढ रही थी| पिता के पैसो से घर का खर्चा चलाना बहुत कठिन हो गया था| दिन प्रतिदिन घर के हालात ख़राब हो रहे थे|उम्मुल झुग्गी झोपडी के बच्चो को पढ़ाकर 100-200 रूपए कमाती थी| और उन्ही पैसो से खुद की पढाई करती थी |उन्ही दिनों उम्मुल को आईएएस बनने का सपना जागा|मुझे पता था यह काफी कठिन परीक्षा होती है | घर मे पढने जैसे हालात नहीं थे और कई बार मेरी हड्डियां भी टूट चुकी थी | पिताजी जी ने मेरी शारीरिक दुर्बलता को देखते हुए उन्होंने अमर ज्योति स्कूल कड़कड़डूमा में भर्ती करा दिया|

वहां मेरी मुलाकात मोहिनी माथुर मेम से हुई|उन्होंने मेरा अर्वाचीन स्कूल में नौवीं में दाखिला कराया | फिर अगले साल मैं दसवी कक्षा में 91 प्रतिशत से टॉप किया| उधर घर में हालात अच्छे नहीं थे | मैंने अपनी पढाई को जारी रखने के लिए त्रिलोकपुरी में एक कमरा लिया| वहां अकेले रहने लगी| वहां मैं बच्चो को पढ़ाकर फिर खुद की पढाई करती थी| 12वीं में भी 89 प्रतिशत में मैं स्कूल में सबसे आगे रही।

अब जब कॉलेज जाने की बारी आई थी तो मन में एक डर था फिर से हड्डियां टूटने का पर मैंने कैसे न कैसे करके DTC बसों में धक्के खाकर Delhi University में Admission लिया|  फिर जेएनयू से शोध और साथ में आईएएस की तैयारी की|

अब परिणाम आप सबके सामने है.. और आगे का सफ़र जारी है | अब सब खुश है मेरे भाई बहन और मेरा परिवार भी |

यदि आपने मन में ठान लिया है कि जीत मेरी ही होनी है तो कोई कारण नहीं कि आप सफल न हों, क्योंकि “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत”

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